बिन गुरु मारग कौन बतावै

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मीरां जब गई वृंदावन के एक मंदिर में, जहां कि स्त्रियों को आने की मनाही थी क्योंकि मंदिर का पुजारी बड़े विक्षिप्त रूप से ब्रह्मचर्य के पीछे पड़ा था। स्त्री को देखता ही नहीं था। मंदिर के बाहर नहीं आता था और मंदिर में स्त्रियों को नहीं आने देता था। जब मीरां पहुंची तो उसने आदमी बाहर खड़े कर रखे थे कि मीरां को अंदर नहीं घुसने देना। मगर मीरां का नाच, उसकी मस्ती! वे भूल ही गए द्वारपाल और मीरा नाचती भीतर प्रवेश कर गई। उन्हें याद जब तक आए, जब तक याद आए तब तक तो वह भीतर पहुंच भी चुकी थी। पुजारी पूजा कर रहा था, उसके हाथ से थाल गिर गया घबड़ाहट में। जो लोग दमन कर लेते हैं वासनाओं का उनकी यही गति होगी। स्त्री को देखकर उसके हाथ से थाल गिर गया, ऐसी कमजोरी! बहुत नाराज हो गया। उसने मीरां से कहा कि भीतर क्यों प्रवेश किया? मेरे मंदिर में स्त्री को प्रवेश नहीं है।

मीरां ने जो वचन कहे वे याद रखने जैसे हैं। मीरां ने कहा, मैंने तो सोचा था कि कृष्ण के अतिरिक्त और कोई पुरुष नहीं है। तो आप भी एक पुरुष और हैं? मैंने तो सुन रखा है कि कृष्ण को जो भी मानते हैं वे सभी यह मानते हैं कि कृष्ण के अतिरिक्त और कोई पुरुष नहीं है। और आप यह क्या पूजा कर रहे हैं? किसकी पूजा कर रहे हैं? अभी तक सखी-भाव पैदा नहीं हुआ, अभी तक राधा नहीं बने? अभी पुरुष हो तुम, अभी तक तुम पुरुष हो?

तीर की तरह चुभ गई होगी छाती में बात लेकिन क्रांति घट गई। पैरों पर गिर पड़ा पुजारी; उसने कहा, मुझे क्षमा कर दो, यह तो मुझे खयाल में ही न आया कि केवल कृष्ण ही पुरुष हैं। कृष्ण के मार्ग पर तो कृष्ण ही पुरुष हैं क्योंकि वह मार्ग स्त्रैण चित्त का मार्ग है। परमात्मा एकमात्र पुरुष है, बाकी सब स्त्रियां हैं। यह समर्पण का मार्ग होगा।

बिन गुरु मारग कौन बतावै, करिए कौन उपाय

दूलनदास कहते हैं, अगर यह बात समझ में आ जाए कि जिंदगी हाथ से जा चुकी जा रही है, यह तेल जला जा रहा है, यह बाती बुझी जा रही है, जल्दी ही घड़ी आ जाएगी, अंधकार छा जाएगा। फिर किए कुछ भी न हो सकेगा, फिर लोग अर्थी पर बांधकर ले चलेंगे। उसके पहले किसी ऐसे व्यक्ति का सत्संग खोज लो, किसी ऐसे व्यक्ति के चरणों में झुक जाओ, किसी ऐसे व्यक्ति से हृदय का नाता जोड़ लो, किसी ऐसे व्यक्ति के साथ आत्मसात हो जाओ जिसने जाना हो; जिसकी सुवास तुम्हें भी पकड़ ले; जिसकी सुंगध तुम्हें भी मत्त कर दे। किसी ऐसे व्यक्ति की सुराही से तुम भी पी लो जिसने पिया हो और जो भर गया हो।

जब तक सत्संग की शराब न पियोगे तब तक कोई मार्ग मिल नहीं सकता। शास्त्रों से नहीं मिलता मार्ग, सद्गुरुओं से मिलता है। सत्संग की शराब पीकर ही कोई भक्ति को उपलब्ध होता है। वहीं तुम सीखोगे मंदिर का दीप कैसे बनना! मंदिर में दीए तो तुमने जलाए हैं, उससे कुछ भी न होगा। मंदिर के दीए कैसे बनोगे?

ओशो