तार्किक समानता

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मैं बिलकुल पत्थर हूं और फिर भी प्रार्थना में डूबना चाहता हूं, पर जानता नहीं कि प्रार्थना क्या है। कैसे करूं प्रार्थना? मुझ अंधे को भी आंखें दें!
आंखों की कोई जरूरत नहीं है प्रार्थना के लिये–आंसुओं की जरूरत है। और अंधा भी रो सकता है उतना ही जितना आंखवाले रो सकते हैं। फिकिर छोड़ो आंखों की। आंखों के मांगने में तो तुमने ज्ञान को मांगना शुरू कर दिया–और ज्ञान प्रार्थना का दुश्मन है। आंसू मांगो। भाव मांगो, हृदय मांगो।
आंखें मांगने में तो तुमने मस्तिष्क मांगना शुरू कर दिया। आंखें तो मस्तिष्क के द्वार हैं। आंखें मत मांगो। आंखें न हुईं तो चलेगा–हृदय चाहिए। और हृदय की भी आंख है। आंखें नहीं हैं–आंख है! मस्तिष्क की दो आंखें हैं, हृदय की एक आंख है। मस्तिष्क द्वंद्वात्मक है, द्वैत है; इसलिये दो आंखें हैं। हृदय की एक आंख है; वही तीसरा नेत्र है, शिवनेत्र। नाम ही है नेत्र का…मैं उसी आंख को प्रेम कहता हूं।
ज्ञान मत मांगो। ज्ञान में हमेशा द्वंद्व है। ज्ञान में तर्क है। और जहां तर्क है वहां कोई निश्चय नहीं। जहां तर्क है वहां विवाद है। जहां विवाद है, वहां कोई निष्पत्ति न हो सकती है न हुई है न होगी। तुम जो भी मानोगे उसके विपरीत तर्क दिये जा सकते हैं। तुम्हारा हर विश्वास खंडित किया जा सकता है, क्योंकि विश्वास और संदेह बराबर शक्ति के हैं। इसलिये तो दुनिया में न आस्तिक जीत पाते न नास्तिक जीत पाते। कितने हजार साल हो गये आदमी को, अब तक निर्णय हो जाना चाहिए था। अगर आस्तिक ठीक थे तो सारी दुनिया आस्तिक हो जाती। अगर नास्तिक ठीक थे तो सारी दुनिया नास्तिक हो जाती। लेकिन कोई निर्णय नहीं हो पाता। आस्तिक अपनी दलीलें देते हैं, नास्तिक अपनी दलीलें देते हैं। दोनों की दलीलें करीब-करीब समान बल की हैं।
मेरा अपना अनुभव यह है कि तर्क हमेशा दोनों तरफ से समान बल का होता है। तर्क वेश्या है। वह किसी के भी साथ जाने को तैयार है। तर्क वकील है। वह किसी के भी साथ जाने को तैयार है–जो पैसे चुका दे, जो कीमत चुका दे, जो खरीद ले। तर्क कभी भी निर्णायक नहीं हो पाता। तुम मानो कि ईश्वर है, तो जिन प्रमाणों के आधार पर तुम मानते हो कि ईश्वर है वे सभी प्रमाण खंडित किये जा सकते हैं; उतने ही बलपूर्वक जितने बलपूर्वक तुमने उन्हें सिद्ध कर रखा है।
इसलिए हर विश्वास के नीचे संदेह दबा रहता है और हर संदेह के नीचे विश्वास की इच्छा बनी रहती है। मेरे देखने में कोई नास्तिक होता है तो उसके भीतर मैं छिपा हुआ आस्तिक देखता हूं और कोई आस्तिक होता है तो उसके भीतर छिपा नास्तिक देखता हूं। नास्तिक-आस्तिक साथ-साथ होते हैं–एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इसलिये मस्तिष्क कहीं भी नहीं ले जाता, सिर्फ भरमाता है, भटकाता है। कोल्हू के बैल की तरह चलाता है। बस घूमते रहते हो एक ही जगह। घूमने से लगता है, चल रहे हो, पहुंच रहे हो। न कहीं पहुंचना होता है न कहीं चलना होता है।
ऐसा हुआ कि बर्नार्ड शा एक होटल में ठहरा था किसी यूरोपीय देश के। उसने टैक्सी बुलाई। उसे स्टेशन जल्दी पहुंचना था। टैक्सी में जाकर बैठ गया। टैक्सी वाले ने गाड़ी शुरू की। बर्नार्ड शा ने कहा कि जल्दी चलो, मुझे जल्दी पहुंचना है। गाड़ी भागने लगी। लेकिन थोड़ी देर बाद बर्नार्ड शा को लगा कि यह तो स्टेशन की तरफ न जाकर उल्टी दिशा में जा रही है। तो उसने पूछा कि तुम कहां जा रहे हो? तो टैक्सी ड्राइवर ने कहा: यह मुझे पता नहीं, यह मुझे किसी ने कहा भी नहीं कि मुझे कहां जाना है। लेकिन एक बात पक्की है कि जहां भी जा रहा हूं तेजी से जा रहा हूं।
बर्नार्ड शा ने सोचा था कि होटल के जिस नौकर को भेजा था टैक्सी बुलाने उसने बता दिया होगा कि स्टेशन जाना है, इसलिये उसने खुद ने तो बताया नहीं कि स्टेशन जाना है; सिर्फ इतना कहा तेजी से चलो, जल्दी पहुंचना है। टैक्सी-ड्राइवर भी पहुंचा हुआ दार्शनिक रहा होगा। उसने भी नहीं पूछा, कि जब खुद जानेवाला नहीं बता रहा है तो मैं भी क्यों पूछूं? सिर्फ तेजी से पहुंचना है, तेजी से पहुंचो।
लोग तेजी से चले जा रहे हैं! खूब सोचते-विचारते, खूब तर्क करते–और भूल ही गये हैं कहां जा रहे हैं!
मस्तिष्क चलाता तो बहुत है, पहुंचाता कहीं नहीं। चलाता काफी तेजी से है!
एक हवाई जहाज रास्ता भटक गया बादलों में। हवाई जहाज के पायलट ने यात्रियों को सूचना दी कि दो समाचार हैं–एक सुखद, एक दुखद। पहले सुखद समाचार, कि हम परिपूर्ण रफ्तार से गन्तव्य की ओर जा रहे हैं; और अब दुखद समाचार कि गन्तव्य कहां है, इसका अब हमें कोई पता नहीं है।
मगर ऐसी अवस्था आदमी की है। बड़ी तेजी से चले जा रहे हैं लोग। और तेजी को कैसे तेज करें, इसके नये-नये ईजाद कर रहे हैं लोग। मगर कहां जा रहे हो?
हृदय मंजिल की सूचना देता है। हृदय गन्तव्य की तरफ संकेत करता है, क्योंकि हृदय प्रेम है। इसलिये हृदय का जो इशारा है वह परमात्मा की तरफ लगा रहता है।

ओशो सहज योग प्रबचन 19