छाया

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एक गांव में एक अफीमची ने रात एक मिठाई के दुकानदार से मिठाई खरीदी। पुरानी कहानी है, आठ आने में काफी मिठाई आयी। रुपया था पूरा; दुकानदार ने कहा कि फुटकर पैसे नहीं हैं, सुबह ले लेना। अफीमची अपनी धुन में था। फिर भी इतनी धुन मग नहीं था कि रुपये पर चोट पड़े तो होश न आ जाए। थोड़ा-थोड़ा होश आया कि कहीं सुबह बदल न जाए। तो कुछ प्रमाण होना चाहिए। चारों तरफ देखा कि क्या प्रमाण हो सकता है। देखा एक शंकरा जी का सांड मिठाई की दुकान के सामने ही बैठा हुआ है। उसने कहा: ठीक है। यही दुकान है…। एक तो अपने को भी याद होना चाहिए कि किस दुकान पर…नहीं अपन ही सुबह कहीं और किसी की दुकान पर पहुंच गए तो झगड़ा-झांसा खड़ा हो जाए। यही दुकान है।

सुबह आया और आकर पकड़ ली दुकानदार की गर्दन और कहा: हद हो गई! मुझे तो रात ही शक हुआ था। मगर इतने दूर तक मैंने भी न सोचा था कि तू धंधा ही बदल लेगा आठ आने के पीछे। कहां हलवाई की दुकान, कहां नाईवाड़ा। वल्दीयत भी बदल ली! आठ आने के पीछे!

नाई तो कुछ समझा ही नहीं। उसने कहा: तू बात क्या कर रहा है! कहां का हलवाई, मैं सदा का नाई!

उसने कहा: तू मुझे धोखा न दे सकेगा। देख वह सांड, अभी भी अपनी जगह बैठा हुआ है! मैं निशान लगाकर गया हूं।

अब सांड का कोई भरोसा है! बैठा था हलवाई की दुकान के सामने सांझ को, सुबह बैठ गया नाई की दुकान के सामने। तुम छाया को पकड़ते हो, छाया छिटकती है। इधर पकड़े उधर छिटकी आज है, कल नहीं है। तुम्हारी जिंदगी व्यर्थ की आपाधापी में व्यतीत हो जाती है–छायाओं को पकड़ने में।