संगीत की महफिल

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मैं जो बोलता हूं वह तुम्हारी क्षमता के अनुसार होता है। अगर यहां सारे नए लोग बैठे हों सुनने को तो मैंने तुमसे जो आज बोला, नहीं बोल सकता था। इसलिए गांव-गांव जाकर लोगों से बोलना मुझे बंद कर देना पड़ा। क्योंकि एक बात अनुभव में आने लगी बार-बार कि अगर भीड़-भाड़ में बोलता रहा तो जो मुझे कहना है कह ही न पाऊंगा। कहना तो दूर, साज भी न बिठा पाऊंगा।

ऐसा हुआ, लखनऊ के नवाब ने – वाजिद अली शाह ने – वाइसराय को निमंत्रण दिया था। संगीत की महफिल जमी। अंग्रेज वाइसराय, पहली दफा भारत आया था। उसे कुछ शास्त्रीय संगीत का तो पता ही नहीं था। संगीत का भी ऐसे कुछ उसे पता नहीं था। बैठक जमी। और लखनऊ के संगीत के प्रेमी इकट्ठे हुए। बड़े से बड़े संगीतज्ञ बुलाए गए थे। वे कसने लगे – कोई अपनी वीणा, कोई अपनी सारंगी, कोई अपना तबला, कोई अपनी मृदंग। वे सब साज बिठाने लगे और वाइसराय सिर हिलाने लगा – सोच कर कि संगीत शुरू हो गया है! वाजिद अली तो बहुत हैरान हुआ। और दूसरे भी बहुत हैरान हुए कि यह क्या हो रहा है! और जब साज बैठ गए और संगीतज्ञ संगीत जन्माने को तत्पर हुए, तो उसने आंख खोली और वाजिद अली से कहा कि संगीत बंद क्यों हो गया? जारी रखा जाए। मुझ बहुत पसंद आया। यही जारी रखा जाए।

तो रात भर यही चला! अब वाइसराय कहे…वही तो मेहमान था। तो रात भर यही चला कि लोग वीणा कसते रहे, तबला ठोंकते रहे। वाजिद अली अपना सिर ठोंकता रहा। बाकी सुननेवाले सिर ठोंकते रहे। और वाइसराय बड़ा प्रसन्न होता रहा कि क्या गजब का संगीत हो रहा है! सुननेवाले के अनुसार…

ओशो