अष्टावक्र महागीता उपदेश

0
1246

अष्टावक्र बोले – स्वयं को जानने वाला बुद्धिमान व्यक्ति इस संसार की परिस्थितियों को खेल की तरह लेता है। उसकी सांसारिक परिस्थितियों का बोझ (दबाव ) लेने वाले मोहित व्यक्ति के साथ बिलकुल भी समानता नहीं है।”

“मुझसे उत्पन्न हुआ विश्व मुझमे ही विलीन हो जाता है। जैसे घड़ा मिट्टी में , लहर जल में और कड़ा सोने में विलीन हो जाता है।”